संत सूरदास के जीवन के बारे में अल्प जानकारी (उसकी तिथि और जन्म की तारीखें वास्तव में बहुत स्पष्ट नहीं हैं), मध्ययुगीन भगवान कृष्ण के साथ जुड़े भूमि ब्रज के कवि गायक है.
सूरदास जी वात्सल्य रस के सम्राट माने जाते हैं। उन्होंने श्रृंगार और शान्त रसों का भी बड़ा मर्मस्पर्शी वर्णन किया है।
इसका अर्थ संवत् १६०७ वि० माना जाता है, अतएवं "साहित्य लहरी' का रचना काल संवत् १६०७ वि० है। इस ग्रन्थ से यह भी प्रमाणित होता है कि सूर के गुरु श्री बल्लभाचार्य थे। इस आधार पर सूरदास का जन्म सं० १५३५ वि० के लगभग ठहरता है, क्योंकि बल्लभ सम्प्रदाय की मान्यता है कि बल्लभाचार्य सूरदास से दस दिन बड़े थे और बल्लभाचार्य का जन्म उक्त संवत् की वैशाख् कृष्ण एकादशी को हुआ था। इसलिए सूरदास की जन्म-तिथि वैशाख शुक्ला पंचमी, संवत् १५३५ वि० समीचीन मानी जाती है। उनकी मृत्यु संवत् १६२० से १६४८ वि० के मध्य मान्य है।
तेई मूँदन नैन कहत हौ , हरि मूरति जिन माहीं |
सूरदास पल मोहिं न बिसरति , मोहन मूरति सोवत जागत ||
इनकी कुछ कवितायेँ आपके लिए ।
(१) अब कै राखि लेहु भगवान |
हौं अनाथ बैठ्यौ द्रुम - डरिया, पारधि साधे बान |
ताकै डर मैं भाज्यो चाहत , ऊपर दुक्य सचान |
दुहूँ भाँति दुख भयौ आनि यह , कौन उबारै प्रान ?
सुमिरत ही अहि डस्यो पारधि , कर छूट्यौ संधान |
सूरदास सर लग्यौ सचानहिं , जय - जय कृपा निधान ||
(२) मेरौं मन अनत कहाँ सुख पावै ||
जैसैं उड़ि जहाज कौ पच्छी , फिरि जहाज पर आवै |
कमल - नैन कौ छाँड़ि महातम , और देव कौं ध्यावै |
परम गंग कौं छाँड़ि पियासौ , दुरमति कूप खनावै |
जिहिं मधुकर अंबुज - रस चाख्यौ , क्यौं करील - फल भावै |
सूरदास प्रभु कामधेनु तजि , छेरि कौन दुहावै ||
(३) वात्सल्य
हरि जू की बाल - छवि कहौं बरनि |
सकल सुख की सींव , कोटि - मनोज - सोभा - हरनि |
भुज भुजंग , सरोज नैननि , बदन बिधु जित लरनि |
रहे बिवरनि , सलिल , नभ , उपमा अपर दुरि डरनि |
मंजु मेचक मृदुल तनु , अनुहरत भूषन भरनि |
मनहुँ सुभग सिंगार - सिसु - तरू , फरयौ अद्भूत फरनि |
चलत पद - प्रतिबिम्ब मनि आँगन घुटुरूवनि करनि |
जलज - संपुट - सुभग - छवि भरि लेति उर जनु धरनि |
पुन्य फल अनुभवति सुतहिं बिलोकि कै नँद - घरनि |
सुर प्रभु की उर बसी बिलकनि ललित लरखरनि ||
भ्रमर - गीत
भ्रमरगीत के गोपी और उद्धव संवाद में वाग्विदग्धता का
विकसित रूप दिखाई देता है | ज्ञान - गरिमा में मंडित
उद्धव को श्रीकृष्ण गोकुल इसलिए भेजते हैं कि वे
गोपियों को निराकार की ओर उन्मुख कर सके |
प्रस्तुत अंश के अंतर्गत गोपियों के प्रत्युन्तरों में
वाग्विदग्धता कूट - कूट कर भरी है | सच पूछिए
तो वाग्विदग्धता का नाम यही है कि सामने वाले
व्यक्ति को ऐसा खरा और चुभता हुआ उत्तर दिया
जाय कि उसकी बोलती बंद हो जाय | साधारण रूप में
इसे हम व्यंग का बड़ा भाई कह सकते हैं , जो
असाधारण लोगों को ही प्राप्त होता है |
(४) ऊधौ मोहिं ब्रज बिसरत नाहीं |
हँस - सुता की सुंदर कगरी , अरु कुज्ज्नी की छाँहीं |
वै सुरभी वै बच्छ दोहिनी ,खरिक दुहावन जाहीं |
ग्वाल - बाल मिलि करत कुलाहल , नाचत गहि गहि बाहीं |
यह मथुरा कंचन की नगरी , मनि - मुक्ताहल जाहीं |
जबहिं सुरति आवति वा सुख की , जिय उमगत तन नाहीं |
अनगत भाँति करी बहु लीला , जसुदा नंद निबाहीं |
सूरदास प्रभु रहे मौन ह्वै , यह कहि कहि पछिताहीं ||
हँस - सुता की सुंदर कगरी , अरु कुज्ज्नी की छाँहीं |
वै सुरभी वै बच्छ दोहिनी ,खरिक दुहावन जाहीं |
ग्वाल - बाल मिलि करत कुलाहल , नाचत गहि गहि बाहीं |
यह मथुरा कंचन की नगरी , मनि - मुक्ताहल जाहीं |
जबहिं सुरति आवति वा सुख की , जिय उमगत तन नाहीं |
अनगत भाँति करी बहु लीला , जसुदा नंद निबाहीं |
सूरदास प्रभु रहे मौन ह्वै , यह कहि कहि पछिताहीं ||
(५) बिनु गुपाल बैरिनि भईं कुंजैं |
तब वै लता लगतिं तन सीतल , अब भई बिषम ज्वाला की पुंजैं |
बृथा बहति जमुना , खग बोलत , बृथा कमल - फूलनि अलि गुँजैं |
पवन , पान , घनसार , सजीवन , दधि - सुत किरनि भानु भई भुँजैं |
यह ऊधौ कहियौ माधौ सौं , मदन मारि कीन्ही हम लुंजैं |
सूरदास प्रभु तुम्हरे दरस कौं , मंग जोवत अँखियाँ भईं छुंजैं |
(६) हमारैं हरि हारिल की लकरी |
मन्क्रम बचन नंद - नंदन उर , यह दृढ़ करि पकरी |
जागत - सोवत स्वप्न दिवस - निसि , कान्ह - कान्ह जकरी |
सुनत लोग लागत है ऐसौ , ज्यौं करुई ककरी |
सु तौ ब्याधि हमकौं लै आए , देखी सुनी न करी |
यह तौ सूर तिनहिं लै सौपौं , जिनके मन चकरी ||
(७) ऊधौ जोग जोग हम नाहीं |
अबला सार - ज्ञान कह जानैं , कैसैं ध्यान धराहीं |
