(१) करुणे , क्यों रोती है ? ' उत्तर ' में और अधिक रोई -
'मेरी विभूति है जो , उसको ' भव - मूर्ति ' क्यौं कहे कोई ! '
(२) मानस मंदिर में सती , पति की प्रतिभा थाप ,
जलती - सी उस विरह में , बनी आरती आप !
(३) उस रुदन्ती विरहिणी के रुदन - रस के लेप से ,
और पाकर ताप उसके प्रिय - विरह विक्षेप से ,
वर्ण - वर्ण सदैव जिनके हों विभूषण कर्ण के ,
क्यौं न बनते कविजनो के ताम्रपत्र सुवर्ण का ?
(४) वेदने , तू भी भली बनी |
पाई मैंने आज तुझी में अपनी चाह घनी |
नई किरण छोड़ी है तुने , तू वह हीर - कनी ,
सजग रहूँ मैं , साल ह्रदय में , ओ प्रिय - विशिख - अनी |
ठंडी होगी देह न मेरी , रहे द्रिगम्बू , सनी ,
तू ही उसे उष्ण रक्खेगी मेरी तपन - मनी |
आ , अभाव की एक आत्मजे , और अदृष्टि - जनी ,
तेरी ही छाती है सचमुच उप्मोचितास्तनी |
अरी वियोग - समाधि , अनोखी , तू क्या ठीक ठनी ,
अपने को , प्रिय को , जगती को देखूँ खिंची तनी |
मन - सा मानिक मुझे मिला है तुझमे उपल - खनी ,
तुझे तभी छोडूँ जब सजनी , पाऊं प्राण - धनी |
(५) विरह संग अभिसार भी ,
भार जहाँ आभार भी |
मैं पिंजड़े में पड़ी हूँ किन्तु खुला है द्वार भी ,
काल कठिन क्यों न हो किन्तु है मेरे लिए उदार भी |
जहाँ विरह ने गार दिया है किया वहाँ उपकार भी ,
सुधबुध हर ली किन्तु दिया है कालज्ञान विचार भी |
जना दिया है उसने मुझको जनजीवन है भार भी ,
और मरण ? वह बन जाता है कभी हिये का हार भी |
जाना मैंने इस उर में थी ज्वाला भी जलधार भी ,
प्रिय ही नहीं यहाँ मैं भी थी , ओर एक संसार भी |
(६) दोनों ओर प्रेम पलता है |
सखि , पतंग भी जलता है हा ! दीपक भी जलता है |
सीस हिलाकर दीपक कहता -
' बन्धु !' वृथा ही तू क्यों दहता ?
पर पतंग पडकर ही रहता |
कितनी विहव्लता है |
दोनों ओर प्रेम पलता है |
बचकर हाय ! पतंग मरे क्या ?
प्रणय छोड़कर प्राण धरे क्या ?
जल नहीं तो मरा करें क्या ?
क्या वह असफलता है ?
दोनों ओर प्रेम पलता है
कहता है पतंग मन मारे -
'तुम महान , मैं लघु पर प्यारे ,
क्या न मरण भी हाथ हमारे ?
शरण किसे छलता है ?
दोनों ओर प्रेम पलता है ?
दीपक के जलने में आली ,
फिर भी है जीवन की लाली |
किन्तु पतंग - भाग्य - लिपि काली ,
किसका वश चलता है
दोनों ओर प्रेम पलता है |
जगती वणिग्वृत्ति है रखती ,
उसे चाहती जिससे चखती ;
काम नहीं , परिणाम निरखती
मुझे यही खलता है |
दोनों ओर प्रेम पलता है |
(७) दरसो परसों घन , बरसो ,
सरसों जीर्ण शीर्ण जगती के तुम नव यौवन , बरसो ,
घुमड़ उठो आसाढ़ उमडकर पावन सावन , बरसो |
भाद्र - भद्र , आश्विन के चित्रित हस्ति , स्वातिघन , बरसो |
सृष्टि दृष्टी के अंजन रंजन , ताप विभंजन , बरसो |
व्यग्र उदग्र जगज्जननी के , आयी अग्रस्तन , बरसो |
गत सुकाल के प्रत्यावर्तन है शिखिनर्तन , बरसो |
जड़ चेतन में बिजली भर दो ओ उद्बोधन बरसो |
चिन्मय बनें हमारे मृण्मय पुल कांकुर बन , बरसो |
मंत्र पढ़ो , छींटे दो , जागे सोयें जीवन , बरसो |
घट पूरो त्रिभुवनमानस रस , कन कन छन छन , बरसो |
आज भीगते ही घर पहुँचे , जन जन के जन बरसो |
(८) रह चिरदिन तू हरी - भरी ,
बढ़ , सुख से बढ़ सृष्टि - सुन्दरी ,
सुध प्रिय तन की मिले मुझे ,
फल जन - जीवन - दान मुझे |
(९) निरख सखी , ये खंजन आये , फेरे उन मेरे रंजन ने नयन इधर मन भाये | फैला उनके तन का आतप , मन ने सर सरसाये , घूमें वे इस ओर वहाँ , ये हंस यहाँ उड़ छाये | करके ध्यान आज इस जन का निश्चय वे मुसकाये , फूल उठे हैं कमल , अधर - से ये बन्धूक सुहाये | स्वागत , स्वागत , शरद , भाग्य से मैंने दर्शन पाये , नभ ने मोती वारे , लो , ये अश्रु अध्र्य भर लाये |
आज भीगते ही घर पहुँचे , जन जन के जन बरसो |
(८) रह चिरदिन तू हरी - भरी ,
बढ़ , सुख से बढ़ सृष्टि - सुन्दरी ,
सुध प्रिय तन की मिले मुझे ,
फल जन - जीवन - दान मुझे |
(९) निरख सखी , ये खंजन आये , फेरे उन मेरे रंजन ने नयन इधर मन भाये | फैला उनके तन का आतप , मन ने सर सरसाये , घूमें वे इस ओर वहाँ , ये हंस यहाँ उड़ छाये | करके ध्यान आज इस जन का निश्चय वे मुसकाये , फूल उठे हैं कमल , अधर - से ये बन्धूक सुहाये | स्वागत , स्वागत , शरद , भाग्य से मैंने दर्शन पाये , नभ ने मोती वारे , लो , ये अश्रु अध्र्य भर लाये |
(१०) कोक , शोक मत कर हे तात , कोकि , कष्ट में हूँ मैं भी तो , सुन तू मेरी बात | धीरज धर , अवसर आने दे , सह ले यह उत्पात , मेरी सुप्रभात वह तेरी सुख - सुहाग की रात !
(११) शिशिर, न फिर गिरि - वन में ,