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जिसके आधार पर केवल इतना ही अनुमान किया जा सकता है कि उनका जन्म संभवतः 800 हि एवं 900 हि. के मध्य, अर्थात सन 1397 ई और 1494 ई के बीच किसी समय हुआ होगा तथा तीस वर्ष की अवस्था पा चुकने पर उन्होंने काव्य-रचना का प्रारंभ किया होगा। पद्मावत का रचनाकाल उन्होंने 947 हि (सन नौ से सैंतालीस अहै- पद्मावत 24)। अर्थात 1540 ई बतलाया है। पद्मावत के अंतिम अंश(653) के आधार पर यह भी कहा जा सकता है कि उसे लिखते समय तक वे वृद्ध हो चुके थे।
इनकी कुछ कवितायेँ आपके सामने प्रस्तुत किया जा रहा है ।
(1) नागमती चितउर पथ हेरा । पिउ जो गए पुनि कीन्ह न फेरा ।।
नागर कहु नारि बस परा । तेई मोर पिउ मोसौ हरा ।।
सुआ काल होई लेइगा पीऊ । पिउ नहिं जात , जात बरु जीऊ ।।
भयऊ नरायन बाबन करा । राज करत रजा बलि छरा ।।
करन पास लिन्हेउ कै छंदू । बिप्र रूप धरि झिलमिल इंदू ।।
मानत भोप गोपिचंद भोगी । लेई अपसवा जलंधर जोगी ।।
लै कान्हही भा अकरूर अलोपी । कठिन बिछोह जियहिं किमी गोपी ।।
दोहा -
सारस जोगि कौन हरि , मारि वियाधा लीन्ह ?
झुरी झुरी पींजर हौं भई , बिरह काल मोहि दीन्ह ।
(2) पीउ बियोग अस बाउर जीऊ । पपिहा निति बोलै पिउ पीऊ ।।
अधिक काम दाधे सो रामा । हरि लेई सुवा गएउ पिउ नामा ।।
बिरह बान तस लाग न डोली । रकत पसीज , भींजि गई चोली ।।
सूखा हिया , हार भा भारी । हरे हरे प्रान तजहिं सब नारी ।।
खन एक आव पेट मँह । साँस । खनहीं जाई जिउ , होइ निरासा ।।
पवन डोलावही , सीचहिं चोला । पहर एक समुझहिं मुख बोला ।।
प्रान पयान होत को राखा ? को सुनाव पीतम कै भाखा ।।
दोहा -
आहि जो मारै बिरह कै , आगि उठै तेहि लागि ।
हंस जो रहा समीर महँ , पाँख जरा , गा भागि ।।
(3) पाट महादेव । हिये न हारू । समुझि जीउ , चित चेतु संभारू ।।
भौंर कँवल सँग होइ मेरावा । संवरी नेह मालति पहँ आवा ।।
पषिहे स्वाती सो जस प्रीती । टेकु पियास , बांधु मन थीती ।।
धरतिही जैस गगन सौं नेहा । पलटी आव बरषा ऋतु मेहा ।।
पुनि बसंत ऋतु आव नवेली । सो रस , सो मधुकर , सो बेली ।।
जिन अस जीव करसि तू बारी । यह तखिर पुनि उठिही सँवारी ।।
दिन दस बिनु जल सूखि बिधंसा । पुनि सोई सरवर हंसा ।।
दोहा -
मिलहिं जो बिछुरे साजन , अंकम भेंटी गहंत ।
तपनि मृगसिरा जे सहे , ते अद्रा यलुहंत ।।
(4) चडा असाड , गगन घन गरजा । साजा बिरह दुंद दल बाजा ।।
धूम साम , धौरे घन धाए । सेत धजा बग पांति देखाए ।।
खड़क बीजु चमकै चहुँ ओरा । बुंद बान बरसींह घन घोरा ।।
ओनई घटा आइ चहुँ फेरी । कंत । उबारू मदन हौं घेरी ।।
दादुर मोर कोकिला पीऊ । गिरै बीजु , घट रहै न जीऊ ।।
पुष्प नखत सिर ऊपर आवा । हौं बिनु नाह , मंदिर को छावा ?
अद्रा लाग लागि भुइं लेई । मोहिं बिनु पिउ को आदर देई ।।
दोहा -
जिन्ह घर कंता ते सुखी , जिन्ह गारौ औ गर्व ।।
कंत पियारा बाहिरै , हम सुख भूला सर्ब ।।
(5) सावन बरस मेह अति पानी । भरनी परी , हौं बिरह झुरानी ।।
लाग पुनरबसु पीउ न देखा । भई बाउरी , कहँ कंत सरेखा ।।
रकत कै आँसु परहिं भुइं टूटी । रेंगी चलीं जस बीरबहूटी ।।
सखिन्ह रचा पिऊ संग हिंडोला । हरियरी भूमि कुसुंभी चोला ।।
हिय हिंडोला अस डोलै मोरा । बिरह भुलाई देई झकझोरा ।।
बाट असूझ अथाह गंभीरी । जिउ बाउर भा , फिरै भंभीरी ।।
जग जाल बूड़ जहाँ लगि ताकी । मोरि नाव खेवक बिनु थाकी ।।
दोहा -
परबत समुद अगम बीच , बीहड़ घन बनदान्ख ।
किमि कै भेटों कन्त तुम्ह ? ना मोहिं पाँव न पाँख ।।
(6) भा भादों दूभर अति भारी । कैसे भरों रैनी अँधियारी ।।
मंदिर सून पिउ अनतै बसा । सेज नागिनी फिरि फिरि डसा ।।
रहौ अकेलि गहे एक पाटी । नैन पसारि मरौ हिय फाटी ।।
चमक बीजु घन गरजि तरासा । बिरह काल होइ जीउ गरासा ।।
बरसै मधा झकोरि झकोरि । मोर दुई नैन चुवैं जस ओरी ।।
धनि सुखे भरे भादौं माहाँ । अबहुँ न आएन्ही सीचेन्ही नाहाँ ।।
पुखा लाग भूमि जल पूरी । आक जवास मई तस सूरी ।।
दोहा -
धनि जोवन अवगाह , महँ , दे बुडत , पिऊ ! टेक ।।थल जल भरे अपूर सब , धरती गगन मिलि एक ।
(7) लाग कुवार , नीर जग घटा । अबहुँ आउ , कंत । तन लटा ।।
तोहि देखे पिउ । पलुहै कया । उतरा चीतु बहुरि करू मया ।।
चित्रा मित्र मीन घर आवा । पपिहा पीउ पुकारत पावा ।।
उआ अगस्त , हस्ति घन गाजा । तुरय पलानि चदे रन राजा ।।
स्वाति बूंद चातक मुख परे । समुद सीप मोती सब भरे ।।
सखर संवारी हंस चलि आए । सारस कुरलहिं , खंजन देखाए ।।
भा परगास , बाँस घन फूले ! कंत न फिरे बिदेसहिं भूले ।।
दोहा -
बिरह हस्ति तन सालै , घाय करै चित चूर ।
बेगि आइ , पिउ । बाजहु , गाजहु होइ सदूर ।।
(8) कातिक सरद चंद उजियारी । जग सीतल , हौं बिरहै जारी ।।
धौदाह करा चाँद परगासा । जनहूँ जरैं सब धरती अकासा ।।
तन मन सेज जरै अगिदाहू । सब कहं चंद , भएउ मोहि राहू ।।
चहुँ खंड लागै अंधियारा । जौं घर नाहीं कंत पियारा ।।
अबहुँ , निठुर । आउ एहि बारा । परब देवारी होइ संसारा ।।
सखि झूमक गाकै अंग मोरी । हौं झुरावं , बिछुरी मोरि जोरी ।।
जेहि घर पिउ सो मनोरथ पूजा । मो कहँ बिरह , सवति दुख दूजा ।।
दोहा -
सखि मानै तिउहार सब गाइ देवारी खेली ।
हौं का गावौं कंत बिनु , रही छार सिर मेलि ।।
(9) अगहन दिवस घटा , निसि बाड़ी । दूभर रैनी , जाइ किमि गाठी ?
अब यहि बिरह , दिवस भा राती । जरौं बिरह जस दीपक बाती ।।
कांपै हिया जनावै सीऊ । तो पै जाई होइ संग पीऊ ।।
घर घर चीर रचे सब कहू । मोर रूप रंग लइगा नाहू ।।
पलटी न बहुरा गा जो बिछोई । अबहूँ फिरै , फिरै रँग सोई ।।
सियरी अगिनी बिरहिन हिय जारा । सुलुगी सुलुगी दगढ़ै होइ छारा ।।
यह दुख दगध न जानै कंतु । जोबन जनम करै भसमन्तु ।।
कंत कहाँ लोगौं ज्योहि दीयारे । पथ अपार , सूझ नहीं नियरे ।।
सौरं सपेती आवै जुड़ी । जानहु सेज हिवंचल बुडी ।।
चकई निसि बिछुरै दिन मिला । हौं दिन राति बिरह कोकिला ।।
रैनी अकेलि साथ नहिं सखी । कैसी जियै बिछोही पखी ।।
बिरह सचान भएउ तन जाड़ा । जियत खाई औ मुए न छाड़ा ।।
पहल पहल तन रुई झांपै । हहरि हहरि अधिकौ हिय कांपै ।।
आर सूर होइ तपु , रे नाहा । तोहि बिनु अंग लाग सर चिरु ।।
अब यहि बिरह , दिवस भा राती । जरौं बिरह जस दीपक बाती ।।
कांपै हिया जनावै सीऊ । तो पै जाई होइ संग पीऊ ।।
घर घर चीर रचे सब कहू । मोर रूप रंग लइगा नाहू ।।
पलटी न बहुरा गा जो बिछोई । अबहूँ फिरै , फिरै रँग सोई ।।
सियरी अगिनी बिरहिन हिय जारा । सुलुगी सुलुगी दगढ़ै होइ छारा ।।
यह दुख दगध न जानै कंतु । जोबन जनम करै भसमन्तु ।।
दोहा -
पिउ सौ कहेउ संदेसडा , हे भौंरा ! हे काज ।
सो धनि बिरहे जरि मुई , तेहि न धुवाँ हम्ह लाग ।।
(10) पूस जाड़ थर थर तन काँपा । सुरुज जाई लंका दिसि चाँपा ।।
बिरह बाड़ , दारुन भा सीऊ । कंपि कंपि मरौं , लेई हरि जीऊ ।।
सौरं सपेती आवै जुड़ी । जानहु सेज हिवंचल बुडी ।।
चकई निसि बिछुरै दिन मिला । हौं दिन राति बिरह कोकिला ।।
रैनी अकेलि साथ नहिं सखी । कैसी जियै बिछोही पखी ।।
बिरह सचान भएउ तन जाड़ा । जियत खाई औ मुए न छाड़ा ।।
दोहा -
रकत दुरा मान्सू गरा , हाड़ भएउ सब संख ।
धनि सारस होइ ररि मुई , पीऊ समेटाही पंख ।।
(11) लागेउ माघ , परै अब पाला । बिरहा काल भएउ जड्काला ।।पहल पहल तन रुई झांपै । हहरि हहरि अधिकौ हिय कांपै ।।
आर सूर होइ तपु , रे नाहा । तोहि बिनु अंग लाग सर चिरु ।।
टप - टप बूंद परहिं जस ओला । बिरह पवन होइ मारै सोला ।।
कहि क सिंगार को पहिरू पटोरा । गीउ न हार , रही होद डोरा ।।
दोहा -
तुम बिनु कांपै धनि हिया , तन तिनउर भा डोल ।
तेहि पर बिरह जराई कै , चाहै उडावा झोल ।।
(12) फाल्गुन पवन झकोरा बहा । चौगुन सीऊ जाइ नहिं सहा ।।
तन जस पियर पात भा मोरा । तेहि पर बिरह देई झकझोरा ।।
तखिर झरहिं , झरहिं बन दाखा । भई ओनंत फुलिफरी साखा ।।
करहिं वनस्पति हिये हुलासू । मो कहँ भा जग दून उदासू ।।
फागु करहिं सब चांचरी जोरी । मोहिं तन लाइ दीन्ह जस होरी ।।
जो पै पीउ जरत अस पाया । जरत मरत मोहि रोष न आवा ।।
राति दिवस सब यह जिउ मोरे । लगौं निहोर कंत अब तोरे ।।
राति दिवस सब यह जिउ मोरे । लगौं निहोर कंत अब तोरे ।।
